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1881 की ब्रिटिश क्रूरता के खिलाफ सीना तानकर तोप के आगे शहीद होने वाले कोलावीरा के नायकों को सम्मान; छत्तीसगढ़-ओडिशा की साझी विरासत पर गर्व”*

 

आज देश और समाज के स्वाभिमान को जगाने वाले एक अत्यंत ऐतिहासिक और भावुक क्षण का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अखिल भारतीय गोंडवाना गोंड महासभा के पदाधिकारी और समाज के प्रबुद्ध लोग आज ओडिशा के ऐतिहासिक *कोलावीरा राजमहल पहुँचे।* वहाँ उन्होंने महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवारों के वंशजों से आत्मीय मुलाकात कर अमर शहीदों के संघर्षों को नमन किया।

यह ऐतिहासिक भेंट केवल एक शिष्टाचार नहीं, बल्कि मुख्यधारा के इतिहास में हाशिए पर धकेल दिए गए हमारे वास्तविक सामाजिक और राष्ट्रीय नायकों की पहचान व अस्मिता को पुनर्जीवित करने का एक बड़ा शंखनाद है।

इस गौरवशाली अवसर पर *अखिल भारतीय गोंडवाना गोंड महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कांकेर के पूर्व विधायक श्री शिशुपाल शोरी* तथा *महासभा के राष्ट्रीय सचिव श्री आर. एन. ध्रुव* सहित महासभा के तमाम सदस्य राजमहल में विशेष रूप से उपस्थित रहे। महासभा के लोगों ने कोलावीरा राजवंश के अमर शहीदों की 10 वीं पीढ़ी के प्रतिनिधि वीर अमरेंद्र प्रताप सिंह एवं 11वीं पीढ़ी के श्री वेंकटेश सहित संपूर्ण राजपरिवार के सम्मानित सदस्यों से मुलाकात की और समाज की ओर से गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।

इतिहास गवाह है कि जयपुर स्टेट कोलावीरा (ओडिशा) के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी *महान शहीद श्री करुणाकर सिंह* और उनके वीर सुपुत्र — स्व. श्री कृष्ण कुमार सिंह नायक, स्व. श्री खगा सिंह नायक एवं स्व. श्री कन्हई सिंह नायक ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जो मोर्चा खोला था, वह अद्वितीय है। इन क्रांतिकारियों की बढ़ती ताकत से खौफ खाकर, सन् 1881 में अंग्रेजों ने मद्रास रेजीडेंसी से विशेष रूप से तोप मंगाकर, धोखे से इन्हें तोप से उड़ा दिया था। जल, जंगल, जमीन और माटी की रक्षा के लिए हंसते-हंसते तोप के आगे सीना तान देने वाले इन वीरों का बलिदान आज भी समाज में क्रांति की अलख जगाता है।

यह भूमि केवल रणबांकुरों की ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना को दिशा देने वाली बेटियों की भी धरती रही है। पिथौरा (छत्तीसगढ़) के राजमहल की राजमाता विष्णु प्रिया देवी ने अपनी जनता के विकास के लिए जो अभूतपूर्व कार्य किए, वे कोलावीरा की ही देन थीं। वहीं, पृथक गोंडवाना राज्य की मांग को प्रखर राजनैतिक आवाज देने वाले पानाबरस (छत्तीसगढ़) के राजा लाल श्याम शाह की धर्मपत्नी राजमोहिनी देवी का मायका भी कोलावीरा ही है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच का यह अटूट पारिवारिक और सामाजिक संबंध हमारी साझी विरासत और राजनैतिक चेतना का मजबूत आधार है।

सन् 1917–18 में निर्मित *कोलावीरा का ऐतिहासिक राजभवन* आज भी सीना ताने खड़ा है। यह भवन सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की वीरता और ब्रिटिश दमन के खिलाफ स्वाभिमान से जीने की हुंकार है।

राजमहल में हुई इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शिशुपाल शोरी एवं राष्ट्रीय सचिव श्री आर. एन. ध्रुव ने संकल्प लिया कि इन महान सेनानियों और सामाजिक नायकों के इतिहास को अब दबने नहीं दिया जाएगा। महासभा इस गौरवगाथा को गांव-गांव और जन-जन तक पहुँचाएगी ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों, अपने अधिकारों और अपने ऐतिहासिक स्वाभिमान के प्रति जागरूक हो सके।

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