विषय: “स्वदेशी (आदिवासी) दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की रक्षा”
आदरणीय सभी माताओं, बहनों, भाइयों, युवा साथियों तथा सभी सम्मानित जनों को रावेन शाह उईके का सादर सेवा जोहार, अभिवादन है ।
हम सभी 9 अगस्त, विश्व आदिवासी दिवस के पावन अवसर पर एकत्रित होंगे । यह दिन केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति, हमारी परंपराओं, हमारे अधिकारों और हमारे गौरव का दिन है।
विश्व के करोड़ों मूल मालिकों, देशज जनों/कोयतुर जनों/आदिवासी समुदाय प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक रहे हैं। जल, जंगल और जमीन केवल उनके जीवन का आधार नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का प्रतीक हैं। आदिवासी समाज ने सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने का संदेश पूरी दुनिया को दिया है।
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 के लिए विश्व आदिवासी दिवस की थीम रखी है—”स्वदेशी (मूल मालिकों, देशज जनों/कोयतुर जनों/आदिवासी) दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की रक्षा।”
यह विषय हमें याद दिलाता है कि आदिवासी दाइयाँ केवल प्रसव कराने वाली महिलाएँ नहीं हैं, बल्कि वे पीढ़ियों से चली आ रही चिकित्सा परंपराओं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक हैं। उनके अनुभव और ज्ञान ने अनगिनत माताओं और बच्चों के जीवन की रक्षा की है। आज आवश्यकता है कि इस अमूल्य ज्ञान का सम्मान किया जाए और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ समन्वय स्थापित किया जाए।
प्रिय सगा भाई – बहनों / मूल मालिकों, देशज जनों/कोयतुर जन मेरे साथियों!
गोंडवाना भूभाग का भारत मूल मालिकों, देशज जनों/कोयतुर जनों आदिवासी संस्कृति की समृद्ध भूमि है। हमारे देश में संविधान में अधिसूचित सैकड़ों जनजातियाँ अपनी अलग भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, त्योहार, पहनावा और जीवन शैली के साथ देश की विविधता को समृद्ध बनाती हैं। गोंड, भील, परधान , नागारची , संथाल, मुंडा, कोल , बैगा, कोरकू, उरांव और अनेक सभी अन्य जनजातियों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अमूल्य योगदान दिया है।
आदिवासी समाज की प्राचीन व्यवस्था हमें सिखाता है कि प्रकृति से जितना लें, उससे अधिक उसे लौटाने का प्रयास करें। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट का सामना कर रही है, तब आदिवासी जीवन दर्शन मानवता के लिए प्रेरणा बन सकता है।
साथियों , मूल मालिकों देशज जनों/कोयतुर जनों
हमें अपनी मातृभाषाओं, लोक परंपराओं, पारंपरिक ज्ञान, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनी होगी। साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तकनीक और आर्थिक विकास के अवसरों का लाभ उठाकर समाज को आगे बढ़ाना होगा। हमारी नई पीढ़ी आधुनिक शिक्षा प्राप्त करे, लेकिन अपनी संस्कृति और पहचान को कभी न भूले।
आइए, आज इस अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि—
– अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं का सम्मान करेंगे।
– जल, जंगल और जमीन की रक्षा करेंगे।
– आदिवासी महिलाओं और पारंपरिक दाइयों के योगदान का सम्मान करेंगे।
– शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देंगे।
– आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर रखेंगे।
अंत में, मैं विश्व के सभी आदिवासी समुदायों को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। आइए, हम सभी मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ हर आदिवासी समुदाय को सम्मान, समान अवसर, न्याय और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले।
रावेन शाह उईके
गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन
9407382792
सिवनी छपारा मध्यप्रदेश




